सरगुजा जिले में ग्रामिण स्तर पर प्राप्त जनसुविधाएँ एवं ग्रामीण शिशु मत्र्यता: एक भौगोलिक विश्लेषण
डा टिके सिंह
सहायक प्राध्यापक, भूगोल अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
प्रस्तुत अध्ययन सरगुजा जिले में ग्रामीण शिशु मत्र्यता से संबंधित है। यह अध्ययन प्राथमिक आंकडो पर आधारित है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देष्य जिले में ग्रामीण शिशु मत्र्यता एवं उसको प्रभावित करने वाले प्राप्त जनसुविधाओं का विष्लेषण करना है। अध्ययन हेतु जिले से 38 ग्रामों का प्रतिचयन यादृच्छिक विधि के द्वारा किया गया है। इस हेतु दो प्रकार की अनुसूची का प्रयोग किया गया है। प्रथम पारिवारिक और द्वितीय व्यक्तिगत अनुसूची। व्यक्तिगत अनुसूची द्वारा 38 ग्रामों की 2691 विवाहित महिलाओं से सूचना एकत्र किया गया, जिन्होंने सर्वेक्षण के एक वर्ष के अन्दर शिशु को जन्म दिया हो अथवा जिनकी एक वर्ष से कम उम्र के शिशु की मृत्यु अथवा मृत जन्म हुआ है। जिले में शिशुु मत्र्यता दर 71.3 प्रति हजार है। जिले में शिशु मत्र्यता दर बालकों में 72.0 प्रति हजार तथा बालिकाओं में 65.4 प्रति हजार है। परिजन्म मत्र्यता दर 22.3 प्रति हजार, नवजात मत्र्यता दर 33.9 प्रति हजार तथा नवजातोत्तर मत्र्यता दर 37.4 प्रति हजार है। प्रस्तुत शोध पत्र में ग्रामिण स्तर पर प्राप्त जनसुविधाएँ-चिकित्सा सुविधा, शैक्षणिक सुविधा, निकटतम नगर से ग्रामों की दूरी, यातायात की सुविधा, दवाई-दुकान एवं बाजार की सुविधा आदि को शामिल किया गया है। जिले के उपर्युक्त सुविधा युक्त गांवों की तुलना में उपर्युक्त सुविधाएं नहीं वाले गावों में शिशु मत्र्यता अधिक है। अतः ग्रामिण स्तर पर प्राप्त जनसुविधाएँ शिशु मत्र्यता दर को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक ळें
परिवार, मत्र्यता, प्रारंभिक (परिजन्म), नवजात, नवजाŸाोतर, विकासखण्ड;
प्रस्तावनाः
किसी क्षेत्र की जनसंख्या परिवर्तन के प्रमुख घटकों में प्रजननता, मत्र्यता तथा प्रवास का स्थान महत्वपूर्ण है। मत्र्यता जनसंख्या वृद्धि का एक आधारभूत घटक है। मत्र्यता के निर्धारक तत्व एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवर्तनशील है। मत्र्यता की न्यूनता जनसंख्या विकास का सर्वोत्तम सूचक होता है।
किसी क्षेत्र के मत्र्यता के निर्धारण में आयु संरचना सर्वाधिक महत्वपूर्ण जनांकिकीय कारक है। यद्यपि शिशु एवं वृद्ध में आयु विशिष्ट मत्र्यता दर उच्च होती है, तथापि मत्र्यता के निर्धारण में शिशु मत्र्यता महत्वपूर्ण स्थान रखता है। शिशु मत्र्यता किसी क्षेत्र के विकास का एक संवेदनशील सूचक है। किसी भी क्षेत्र में शिशु मत्र्यता के जननांकिकीय महत्व तथा इसके अनेक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के फलस्वरूप भूगोलविद् इसके वितरण प्रतिरूप में अत्याधिक रूचि लेते हंै।
आयु के अनुसार मृत्यु दर में अंतर पाया जाता है। भिन्न-भिन्न कारणों से कम आयु वर्ग में मृत्यु दर अधिक होती है तथा उसके बाद मृत्यु का दबाव घटने लगता है। शिशु मत्र्यता दर किसी समुदाय की स्वास्थ्य दशाओं का एक उपयोगी एवं विश्वसनीय सूचक है। भारत में शिशु मत्र्यता दर असाधारण रूप से अधिक है (34 प्रति हजार एस.आर.एस., 2011)। छत्तीसगढ़ में हर साल एक हजार बच्चों में से 39 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं, और पांचवा साल पूरा किए बगैर काल के गाल में समा जाते है। मत्र्यता को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में रखा जा सकता है - प्रथम जैव और द्वितीय पर्यावरणीय। शिशुु मत्र्यता दर में अत्याधिक विभिन्नता दृष्टिगत होती है। विकासित देशों में यह अत्यल्प (6 प्रति हजार) और विकासशील देशों में अति उच्च (52 प्रति हजार) है। मृत्यु अनेक जटिलताओं एवं अंर्तसंबंधित कारणों का प्रतिफल है। अधिक शिशु मृत्यु दर के कारण भारतीय जनता परिवार नियोजन के स्थायी उपाय अपनाने से डरते है।
अध्ययन के उद्देश्यः
प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य सरगुजा जिले के ग्रामीण जनसंख्या में शिशु मत्र्यता के स्थिति का आकलन एवं ग्रामिण स्तर पर प्राप्त जनसुविधाएँ का शिशु मत्र्यता पर प्रभाव की व्याख्या करना है।
आँकड़ों के स्रोत एवं विधितंत्र
प्रस्तुत अध्ययन प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित है। इस अध्ययन हेतु जिले के 19 विकासखण्डों में से प्रत्येक से दो गाँव का प्रतिचयन यादृच्छिक विधि (त्ंदकवउ ैउचसपदह) द्वारा किया गया है। गाँवों के केवल उन्हीं महिलाओं से सूचना एकत्र की गई है जिन्होंने गत 5 वर्ष में किसी शिशु को जन्म दिया है अथवा जिनकी शिशु की मृत्यु हुई है। इन महिलाओं से शिशु मृत्यु तथा प्रभावित करने वाले समाजिक कारक संबंधी सूचना एकत्र किया गया है। आँकड़ों के संकलन के लिए दो प्रकार की अनुसूची का प्रयोग किया गया है। प्रथम पारिवारिक एवं द्वितीय व्यक्तिगत।
अध्ययन क्षेत्रः
सरगुजा जिला छत्तीसगढ़ प्रदेश के उत्तर में 22037‘22‘‘ से 24016‘17‘‘ उत्तरी अक्षांश तथा 82035‘ से 84051‘ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है। इसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 15731 वर्ग कि.मी. है। 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश की कुल जनसंख्या 2359886 है। जिले में प्रति हजार पुरूषों के पीछे स्त्रियों की संख्या 978 है। जिले की 60.01 प्रतिशत जनसंख्या साक्षर है। जिले को 5 अनुविभागों, 9 तहसीलों एवं 19 विकासखण्डों में विभाजित किया गया है। जिले की 70 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती है। अंबिकापुर नगर जिले का प्रशासनिक केन्द्र है। सर्वेक्षित 2520 परिवारों की कुल जनसंख्या 15571 है। इसमें 1010 (6.5 प्रतिशत) अनुसूचित जाति और 9837 (63.2 प्रतिशत) अनुसूचित जनजाति जनसंख्या है।
शिशु मत्र्यताः
शिशु मृत्यु दर = किसी वर्ष में एक वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत संख्या ˟ 1000
उसी वर्ष में सजीव जीवित जन्मों की कुल संख्या
शिशु मृत्युदर का संबंध आयु के प्रथम वर्ष में होने वाली शिशु मृत्यु से है। यह किसी वर्ष में एक वर्ष से कम आयु वाले शिशुुओं की मृत्यु संख्या और उसी वर्ष में जन्म लेने वाले कुल जीवित शिशुुओं की संख्या के अनुपात को प्रदिर्शित करता है। जिसे प्रति हजार में व्यक्त किया जाता है।
सरगुजा जिले में शिशु मत्र्यता दर 71.3 प्रति हजार है, जो संपूर्ण भारत (40.0 प्रति हजार) एवं छत्तीसगढ़ (46.0 प्रति हजार, एन. आई. टी. आई. 2013) से काफी अधिक है। जिले में बालिकाओं से बालकों में शिशु मत्र्यता दर अधिक है। शिशु मत्र्यता दर बालकों में 72.0 प्रति हजार तथा बालिकाओं में 65.4 प्रति हजार है।
जिले में सबसे अधिक शिशु मत्र्यता दर 195.0 प्रति हजार (उदयपुर विकासखण्ड) है। इसके बाद बतौली विकासखण्ड में (112.5), का द्वितीय स्थान है। शिशु मत्र्यता दर प्रेमनगर में 100.3, मैनपाट में 99.1, सीतापुर तथा रामचंद्रपुर विकासखण्ड में 82.7, शंकरगढ़ में 68.6, बलरामपुर में 67.6, लखनपुर में 64.5, राजपुर में 52.6, अंबिकापुर में 48.5, प्रतापपुर में 43.5, कुसमी में 34.7, सूरजपुर में 32.5 प्रति हजार है तथा सबसे कम शिशु मत्र्यता दर रामानुजनगर विकासखण्ड में 18.6 प्रति हजार है।
बालको में शिशु मत्र्यता दर उदयपुर विकासखण्ड में 172.0, बतौली में 82.0, मैनपाट विकासखण्ड में 47.7 प्रतिहजार है जो बालिकाओं में क्रमशः 216.9, 131.3 तथा 16.8 प्रतिहजार है। इसके विपरीत रामानुजनगर, सूरजपुर एवं कुसमी विकासखण्ड में बालकों में शिशु मत्र्यता दर क्रमशः 75.4, 39.0, 20.6 प्रतिहजार है जो बालिकाओं में क्रमशः 90.4, 26.0 और 47.6 प्रतिहजार है। नवजात मत्र्यता दर उदयपुर विकासखण्ड में 99.1, बतौली में 18.8 तथा मैनपाट में 56.6 प्रतिहजार है, जबकि रामानुजनगर में 43.9 प्रतिहजार है (सारणी 1)।
शिशु मृत्यु का कारणः
शिशु मृत्यु के अनेक कारण हैं। जनांकिकीविदों ने शिशु मत्र्यता के कारणों को दो वर्गों में रखा है-अंतर्जात और बहिर्जात। अंतर्जात कारण मूलतः जैव-कारण होते है। जिनमें प्रमुख कारण है-अपरिवक्वता (जन्म के समय शिशु का वजन 2500 ग्राम से कम), जन्म के समय ही कु-रचित, जन्म की चोटें, दम घुटना और जीवन के प्रारंभिक दिनों में ही व्यवस्थित पालन-पोषण की कमी।
बहिर्जात कारकों में पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव से उत्पन्न संक्रामक रोग जैसे - क्षय रोग, पाचन क्रिया संबंधी रोग, निमोनिया, आदि आते हैं जिनका संबंध जलवायु, आहार-आपूर्ति तथा जीवन-दशाओं से होता है। अर्थात् बहिर्जात कारणों में वातावरणीय कारक प्रमुख है।
सरगुजा जिले में सर्वेक्षित क्षेत्र में सबसे अधिक शिशुु मत्र्यता निमोनिया से 23.1 प्रति हजार हुई है। शिशु मत्र्यता का दूसरा महत्वपूर्ण कारण अतिसार (12.6 प्रति हजार) है। निम्न जन्म वजन में शिशु मत्र्यता दर 7.4 प्रति हजार है। अन्य कारणों में पीलिया, दुर्घटना अनुवांशिक रोग, रक्त दोष श्वास में तकलीफ बुखार है। निमोनिया से होने वाली शिशु मत्र्यता दर बालकों में 25.4 प्रति हजार और बालिकाओं में 20.7 प्रति हजार है। निम्न जन्म वजन से होने वाली शिशु मत्र्यता दर 6.9 प्रति हजार, अवधि पूर्व प्रसव में 4.6 प्रति हजार, जन्मकालीन अभिघात में 6.7 प्रति हजार शिशु मत्र्यता दर है (सारणी 1)।
ग्रामीण स्तर पर प्राप्त जन-सुविधाएँ एवं शिशु मत्र्यताः
शिशु मत्र्यता दर के निर्धारण में जन-सुविधाओं एवं वातावरण का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत जन सुविधाओं की कमी होती है। तथा स्वच्छता के आभाव में आस-पास का वातावरण भी दूषित रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव माता एवं नवजात शिशु के स्वास्थ्य के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों पर भी पड़ता है। इसे दृष्टिगत रहते हुए सरगुजा जिले में जन सुविधाओं एवं वातावरण का विष्लेषण चिकित्सा सुविधाएँ, शैक्षणिक सुविधाएँ, निकटतम नगर से ग्रामों की दूरी, यातायात की सुविधाएँ, दवाई-दुकान, बाजार एवं टेलीफोन, आदि तथ्यों के आधार पर किया गया है।
चिकित्सा सुविधाः
चिकित्सा सुविधा की उपलब्धि शिशु मत्र्यता को अधिक प्रभावित करती है। चिकित्सा सुविधा मानव समाज की प्राथमिक आवष्यकता है। इससे व्यक्ति की जीवन की गुणवता में वृद्धि होती है। समुचित स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है। चिकित्सा सुविधा जनसंख्या वृद्धि एवं शिशु मत्र्यता का एक महत्वपूर्ण तत्व है। क्योंकि चिकित्सा से ही परिवार नियोजन एवं रोग निरोधक उपायों को अपनाया जाता है। गाँवों में चिकित्सा सुविधा की कमी होती है। कुछ गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है, किन्तु चिकित्सक की अनुपस्थिति में इसका कोई औचित्य नहीं होता है। अध्ययन क्षेत्र में 89.5 प्रतिशत गांवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसका मुख्य कारण जन चेतना का आभाव, चिकित्सा संसाधनों की कमी एवं सेवा उपलब्धता की दूर स्थिति है। ”शिक्षा बिना जन सुविधा शिशु मत्र्यता दर को कम करने में महत्वपूर्ण नहीं होगा (पंत, 1999)।“ गाँवों में चिकित्सा सुविधा होने पर माता एवं शिशु टीकाकरण समय पर होता है क्योंकि गाँवों में चिकित्सा सुविधा नहीं होने पर अधिकांश महिलाएँ निकटतम नगर जाने के लिए परिवारों पर निर्भर रहती है। रजिस्ट्रार जनरल आॅफ इंडिया (1978) के अध्ययनों के अनुसार जिन गाँवों में चिकित्सा सुविधा नहीं है वहाँ शिशु मत्र्यता दर उन गाँवों की तुलना में अधिक होता है जहाँ चिकित्सा सुविधा अधिक है।
सरगुजा जिले में सर्वेक्षित 38 गाँवों में केवल (10.5 प्रतिशत) गाँवो में प्राथमिक उपस्वास्थ्य केन्द्र अथवा शिशु कल्याण केन्द्र है। जिले में जिन गाँवों में प्राथमिक उपस्वास्थ्य केन्द्र है, वहाँ शिशु मत्र्यता दर 34.4 प्रति हजार है। ”चिकित्सा सुविधा शिशु मत्र्यता दर को कम करने में सहायक होते है (कांल्डवेल, 1979)।“ इसके विपरीत जिन गाँवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं ह,ै वहाँ शिशु मत्र्यता दर 75.3 प्रति हजार है (सारणी 3)। जिन गाँवों में प्राथमिक उपस्वास्थ्य केन्द्र है वहाँ नवजात शिशु मत्र्यता दर 7.9 प्रति हजार ह,ै जबकि इसके विपरीत जिन गाँवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है वहाँ शिशु मत्र्यता दर चार गुने अधिक (36.6 प्रति हजार) है। अतः चिकित्सा सुविधा शिशु मत्र्यता दर को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
शैक्षणिक सुविधाः
शिक्षा जनसंख्या वृद्धि एवं शिशु मत्र्यता दर को रोकने का एक महत्वपूर्ण तत्व है, क्योंकि यदि गाँव का शैक्षाणिक स्तर ऊँचा है तो निष्चित ही अधिक लोग पढ़े लिखे होगें। वे शिशु की देखभाल बीमारी की स्थिति में यथोचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की कोशिश करते है। इसके विपरीत अशिक्षित लोग उतनी अच्छी तरह से शिशु का ध्यान व सही समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में असमर्थ होते है, क्योंकि वे बीमारी को समझने में समर्थ नहीं होते हैं। राश्ट्रीय स्तर पर अनेक अध्ययन से प्राप्त निश्कर्श के आधार पर शैक्षणिक सुविधा और शिशु मत्र्यता दर में विपरीत संबंध होता है।
सरगुजा जिले में अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र में गाँव, नगरों से दूरी पर स्थित है। इन गाँवों में सिर्फ प्राथमिक स्तर तक की सुविधा है। इन क्षेत्रों में व्याप्त गरीबी के कारण लोग स्कूली शिक्षा को अनावष्यक मानते है, और रोजगारोन्मुख व्यवसाय को प्राथमिकता देते है।
सरगुजा जिले में 57.9 प्रतिशत गाँवों में प्राथमिक पाठशाला, 23.7 प्रतिशत गाँवों में माध्यमिक स्कूल, 13.2 प्रतिशत गाँवों में हाई स्कूल तथा 5.2 प्रतिशत गाँवो में कोई भी शैक्षणिक सुविधा उपलब्ध नहीं है। जिले में शिशु मत्र्यता दर प्राथमिक पाठशाला वाले गाँवों में 76.1 प्रति हजार और माध्यमिक स्कूल वाले गाँवों में 62.6 प्रति हजार है। शिशु मत्र्यता दर हाई स्कूल वाले गाँवों (45.6 प्रति हजार) में माध्यमिक स्कूल वाले गाँवों से 33.7 प्रतिशत कम है (सारणी 4)। नवजात मत्र्यता दर हाई स्कूल वाले गाँवों में (20.6 प्रति हजार) में माध्यमिक स्कूल वाले गाँवों से (28.0 प्रति हजार) 35.9 प्रतिशत कम है। अतः शैक्षणिक सुविधा शिशु मत्र्यता दर को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो रूप से प्रभावित करती है।
निकटतम नगर से दूरीः
गाँव से निकटतम नगर की दूरी और शिशु मत्र्यता दर में घनिष्ट संबंध पाया जाता है। गाँव से निकटतम नगर की दूरी बढ़ने से शिशु मत्र्यता दर में वृद्धि होती है। एवं घटने से शिशु मत्र्यता दर में कमी होती है। सामान्यतया गाँवों का बसाव नगर से दूर होता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव शिशु मत्र्यता दर पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्र में उत्तम स्वास्थ्य सुविधा के अभाव के फलस्वरूप शिशु मत्र्यता दर की संभावना अधिक रहती है। जो गाँव अपने नगर से जितनी दूर होगा नगर में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का उपयोग करने मंे उतना ही असमर्थ होगा। नगर पास होने पर शिशु के अतिसार की स्थिति में जीवन रक्षक घोल कम समय में उपलब्ध हो जाता है और शिशु मत्र्यता दर को नियंत्रित किया जा सकता है।
सरगुजा जिले के सर्वेक्षित क्षेत्र के (60 प्रतिशत गाँव) अपने निकटतम नगर से 15 कि.मी. से अधिक दूरी पर स्थिति है। ये लोग स्थानीय चिकित्सक से किसी बीमारी का उपचार ठीक ढंग से नही करा पाते है, तो चिकित्सा हेतु नगर ले जाते है। कई बार गाँव से नगर की ओर ले जाते समय रास्ते में मृत्यु हो जाती है। इसी कारण इस गाँवों में शिशु मत्र्यता दर उच्च (74.3 प्रति हजार) है। जबकि (10.5 प्रतिशत गाँव) 10 से 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित हैं। इन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर 72.1 प्रति हजार है। (21.1 प्रतिशत गाँव) अपने निकटतम नगर से 5 से 10 कि.मी. की दूरी पर स्थित है इन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर 65.0 प्रति हजार है। सरगुजा जिले में 7.9 प्रतिशत गाँव अपने निकटतम नगर से 5 कि.मी. से कम दूरी पर स्थित है। जिसमें शिशु मत्र्यता दर (64.2 प्रति हजार) अपेक्षाकृत कम है।
यातायात की सुविधाः
किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए यातायात की सुविधा का उपलब्ध होना अत्यंत आवष्यक है। ग्रामीण क्षेत्रांे में बस यातायात प्रमुख साधन होता हैै। गाँवों में सभी बीमारियों का इलाज कराना सम्भव नही हो पाता है, जिससे इलाज कराने के लिए बाहर जाना पड़ता है। अतः गर्भवती महिलाओं, माताओं एवं शिशुओं को सायकल से ही ले जाना मुष्किल कार्य है। अतः तीव्रगामी एवं तीन पहिए या चार पहिए वाला वाहन होना आवष्यक है। यातायात की सुविधा की उपलब्धता के परिणामस्वरूप माता एवं शिशु को निकटवर्ती स्वास्थ्य केन्द्र में समय पर सुगमतापूर्वक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो जाती तथा जिन गाँवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहाँ समीपवर्ती स्वास्थ्य केन्द्र में समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के फलस्वरूप माता एवं शिशु मत्र्यता दर अधिक होती है। ”गाँवों में यातायात की सुविधाएं उपलब्ध कराकर वहाँ के जीवन स्तर में वृद्धि होने से शिशु मत्र्यता दर में भी कमी होती है (भट्टाचार्य, 1999)।“
सरगुजा जिले में सर्वेक्षित 20 गाँवो (52.6 प्रतिशत) में यातायात की सुविधा बस उपलब्ध है। इन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर 68.0 प्रति हजार है। इसके विपरीत 18 गाँवो (47.4 प्रतिशत) में यातायात की सुविधा बस उपलब्ध नही है, इन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर (76.3 प्रति हजार) 12.2 प्रतिशत अधिक है (सारणी 8.7)। जिन गाँवों में यातायात की सुविधा बस उपलब्ध नहीं है, प्रारंभिक नवजात 27.2 प्रति हजार और नवजात मत्र्यता दर 38.2 प्रति हजार है। जिन गाँवों में यातायात सुविधा बस उपलब्ध है, प्रारंभिक नवजात मत्र्यता दर (19.1 प्रति हजार) और नवजात मत्र्यता दर (31.0 प्रति हजार) अपेक्षाकृत कम है (सारणी 6)।
टेलीफोन की सुविधाः
टेलीफोन की सुविधा गाँवों की विकास प्रक्रिया की ओर इंगित करता है। टेलीफोन की सुविधा से भी शिशु मत्र्यता दर आंशिक रूप से प्रभावित होती है। टेलीफोन के माध्यम से प्रसव के समय या शिशु की बीमारी की स्थिति में चिकित्सक को तुरंत बुलाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में शिशु मत्र्यता की सम्भावना कम रहती है।
सरगुजा जिले में सर्वेक्षित गाँवों में से (31.6 प्रतिशत गाँवों) में टेलीफोन की सुविधा नहीं है। इन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर 92.0 प्रति हजार है। उल्लेखनीय है कि जिन गाँवों में टेलीफोन की सुविधा है उनमें शिशु मत्र्यता दर (66.1 प्रति हजार) अपेक्षाकृत कम है (सारणी 7)।
दवाई दुकान की सुविधाः
दवाई दुकान की सुविधा शिशु मत्र्यता दर को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में दवाई की दुकान की सुविधा बहुत कम होती है। बीमारी की हालात में शिशु और माता को सही समय पर दवाइयाँ न मिलने से शिशु मत्र्यता दर एवं मातृत्व मत्र्यता दर दोनों की संभावना बढ़ी रहती है।
सरगुजा जिले में सर्वेक्षित 38 गाँवों में मात्र एक गाँव में दवाई दुकान है। उल्लेखनीय है कि जिस गाँवों में दवाई दुकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है, उन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर 72.8 प्रति हजार है, परन्तु जिस गाँव में दवाई दुकान की सुविधा उपलब्ध है, उस गाँव में शिशु मत्र्यता दर (48.8 प्रति हजार) कम है। वास्तव में दवाई दुकान उपलब्ध वाले गाँव आर्थिक दृश्टि से विकसित होते है (सारणी 8)।
बाजार-हाट की सुविधाः
बाजार-हाट ग्रामीण समाज के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। ग्रामीण क्षेत्रों में सप्ताहिक बाजार का बहुत अधिक महत्व होता है। गाँवों में बाजार होना समीपवर्ती क्षेत्रों के आर्थिक सम्पन्नता को इंगित करता है। बाजार-हाट का प्रभाव शिशु मत्र्यता दर को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। यदि गाँव में ही बाजार उपलब्ध है तो साग-सब्जियों ताजी व अच्छी किस्म की उपलब्ध होती है, जो माता के स्वास्थ्य से सीधे संबंधित होते है। यदि माता का पोशण स्तर उच्च है तो माता के स्वास्थ्य के साथ शिशु भी स्वस्थ्य होगा। अतः गाँवो में बाजार की सुविधा होने से दैनिक उपभोग की वस्तुएँ जैसे हरी सब्जियाँ लोग आसानी से खरीद सकते है जो माता के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यदि गाँव में बाजार नहीं होता है तो बाजार के लिए अन्य गाँवों की ओर जाना पड़ता है।
सरगुजा जिले में सर्वेक्षित 38 गाँवों में से 5.3 प्रतिशत गाँवों (2 गाँवों) में साप्ताहिक बाजार लगता है। जिले में जिन गाँवों में सप्ताहिक बाजार लगता है, उन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर 28.3 प्रति हजार है। इसके विपरीत जिन गाँवांे में बाजार नही लगता है, उन गाँवों में शिशु मत्र्यता दर (74.2 प्रति हजार) 61.9 प्रतिशत आधिक है। जिन गाँवों में बाजार लगता है वे गाँव समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सेवा का केन्द्र होता है जिससे इन गाँवों में यातायात के साधन, शैक्षणिक सेवा, बिजली उपलब्धता, इत्यादि सुविधाएँ भी अपेक्षाकृत उच्च स्तर की होती है जिससे शिशु मत्र्यता दर में निष्चित रूप से कमी होती है (सारणी 9)।
निष्कर्ष
सरगुजा जिले में शिशु मत्र्यता दर बहुत अधिक है, शिशु मत्र्यता दर को कई कारक प्रभावित करते हैं। शिशु मत्र्यता दर को प्रभावित करने वाले कारकों में प्राप्त जनसुविधाओं में चिकित्सा एवं यातायात की सुविधाएँ प्रमुख है। जिले के ग्रामीण क्षेत्र में शिशु मत्र्यता दर को कम करने के लिये ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा सुविधा, शिक्षा सुविधा, मातृत्व एवं शिशु कल्याण संबंधी योजनाओं का क्रियान्वयन और ग्रामीण जागरूकता अभियानों का संवर्धन करना अति आवश्यक है।
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Received on 20.10.2017 Modified on 05.11.2017
Accepted on 19.12.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(4):269-277.